बहस से कोई फायदा नहीं होता




 प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के कुछ समय ही बाद मैंने लंदन में एक रात एक बहुमूल्य सबक सिखा। मैं उस रात Sir Ross Smith  का मैनेजर था। युद्ध के दौरान Sir Ross Smith  फिलिस्तीन में ऑस्ट्रेलियाई सरकार के महत्वपूर्ण व्यक्ति थे युद्ध के बाद Sir Ross  ने आधी दुनिया का हवाई चक्कर लगाकर दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। इस तरह का कारनामा इससे पहले कभी नहीं किया गया था।  इस अभूतपूर्व प्रयास ने जबरदस्त सनसनी फैला दी इंग्लैंड के सम्राट ने उन्हें नाइट की पदवी दी और कुछ समय तक वे ब्रिटिश साम्राज्य के सर्वाधिक चर्चित व्यक्ति में से रहे एक रात मैं Sir Ross Smith   के सम्मान में दिए गए भोज में शामिल हुआ और डिनर के दौरान मेरे बगल में बैठे व्यक्ति ने एक मजाकिया कहानी सुनाई जो एक Quotation  पर आधारित थी, " कोई देवी शक्ति हमारे भाग को नियंत्रित कर सकती है चाहे हम कितनी ही कोशिश करें !"

       कहानी सुनाने वाले ने जिक्र किया कि यह बाइबिल का Quotation  है मैं जानता था कि यह गलत था।  मैं अच्छी तरह जानता था इस बारे में मेरे मन में जरा भी संदेह नहीं था और इसलिए महत्वपूर्ण बनने की लालसा के कारण और अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए मैंने अपने आप को सुधारक समिति का अध्यक्ष बना लिया बहरहाल वह अपनी बकवास पर अड़ा रहा।  क्या? शेक्सपियर का कोटेशन? असंभव !बकवास !यह कोटेशन Bible का ही है और उसे पूरा विश्वास था कि यह सच है। 

       कहानी सुनाने वाला मेरी दाईं तरफ बैठा था और मेरे पुराने दोस्त  frank gaimand  मेरी बाईं तरफ बैठा था Gaimand  ने वर्षों तक सेक्स्पीयर का अध्ययन किया था।इसलिए हमने उन्हीं से इस विवाद का निपटारा करवाने का फैसला किया गैमंड ने हमारी पूरी बात सुनी और टेबल के नीचे से मुझे पैर मारते हुए कहा "डेल, तुम गलत हो यह सज्जन सही है यह कोटेशन बाइबिल का ही है। "

   उस रात को घर लौटते समय मैंने है रास्ते में  गैमंड से कहा तुम जानते थे ना कि ये कोटेशन शेक्सपियर का है ? "हाँ ,हाँ , क्यों नहीं उसने जवाब दिया" हैमलेट नाटक के पांचवे अंक के दूसरे सीन में यह कोटेशन आता है पर मेरे प्यारे दोस्त हम एक समारोह में अतिथि बनकर गए थे।  किसी आदमी के सामने यह सिद्ध करने से क्या फायदा कि वह गलत है क्या इससे वह तुम्हें पसंद करने लगेगा ?क्यों ना उसे उसकी इज्जत बचाने दी जाए ?उसने तुम्हारी राय नहीं पूछी थी। उसे तुम्हारी राय की जरूरत भी नहीं थी उसके साथ Argument क्यों करना? तीखी बहस  से हमेशा बचना चाहिए। "

          मुझे इसी तरह के सबक की सख्त जरूरत थी क्योंकि वाद-विवाद करना या बहस करना मेरा प्रिय शौक था अपनी जवानी में मैं दुनिया की हर बात पर तर्क और  वाद विवाद किया करता  था जब मैं कॉलेज में गया तो मैंने तर्कशास्त्र और तर्क वितर्क का अध्ययन  क्या और वाद विवाद प्रतियोगिता में जोर शोर से हिस्सा लिया मसूरी के लोगों में यह  आदत होती है।  और मैं तो वहां पैदा हुआ था। मैं चाहता था कि दुनिया मुझे देखे और देखती रह जाए बाद में मैंने वाद विवाद और तर्क वितर्क करने के गुर न्यूयोर्क में सिखाये ,और मुझे यह स्वीकार करने में शर्म आती है कि एक बार तो मैंने इस विषय पर एक पुस्तक लिखने की योजना भी बनाई थी।  तब से अब तक मैंने हजार बहसों में भाग लिया है ,उन्हें सुना है ,देखा है और अपने तथा दूसरे लोगों के जीवन में उनके परिणाम देखें हैं। और इसके बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि ईश्वर की बनाई गई इस दुनिया में बहस से एक ही तरीके से फायदा हो सकता -और वह है कि बहस से बचा जाए। बहस से उसी तरह से बचाओ जिस तरह से आप सांप या भूकंप से बचते हो। 
 10 में से 9 बार तो बहस से कोई फायदा इसलिए नहीं होता है क्योंकि दोनों ही पक्ष को Argument के बाद पूरा विश्वास हो जाता है। कि वह सही थे। 
आप बहस  में नहीं जीत सकते। इसलिए क्योंकि आप अगर हार जाते हैं, तब तो आप की हार होती ही है ,परंतु अगर आप जीत भी जाते हैं तो भी आपकी हार होती है क्यों? मान लीजिए आपने सामने वाले आदमी को गलत भी साबित कर दिया अगर आपने यह भी साबित कर दिया कि उसके तक में कोई दम नहीं है और आपने उसकी हर बात की धज्जियां उड़ा दे तो भी क्या होगा? निश्चित रूप से आपको अच्छा लगेगा परंतु उसकी हालत क्या होगी? आपने उसे सबके सामने नीचा दिखाया है आपने उसके गर्व को आहत  किया है वह आपकी जीत से चिढ़ जाएगा। 

 और अपनी इच्छा के बिना जो बात मानता है वह अब भी उसी विचार का होता है सालों पहले मेरी क्लास में पैट्रिक जय हेयर नाम का स्टूडेंट था।  उसकी शिक्षा तो कम थी पर उसे Argument करने में बहुत मजा आता था एक बार वह  सोफर का काम कर चुका था। वह मेरे पास इसलिए आया था क्योंकि वह ट्रक बेचने का काम करता था और उसके ट्रक बिक नहीं रहे थे थोड़े सवालों से ही पता चल गया कि जिन लोगों को वह ट्रक  बेचना चाहता था उनसे बहस करके वह उन्हें अपना विरोधी बना लेता था, अगर कोई ग्राहक उसकी कंपनी के ट्रक में कोई खोट बताता था तो पैट्रिक को जैसे लाल झंडी दिख जाती थी। और वह ग्राहक का गला पकड़ लेता था। पैट्रिक ने इस तरह बहुत सी बहसें  जीती। जैसा उसने बाद में मुझे बताया," मैं अक्सर किसी के ऑफिस से यह कहता हुआ निकलता था कि मैंने 'आज उसे सबक सिखा दिया निश्चित रूप से मैंने उसे सबक सिखा दिया था। ' परंतु मैं उसे कुछ भेज नहीं पाया था। 
मेरी पहली समस्या नहीं थी कि पैट्रिक को बोलना सिखाया जाए।  मेरी समस्या तो यह थी की पैट्रिक को बोलने से और बहस करने से कैसे रोका जाए।     पैट्रिक कुछ समय बाद वाइट मोटर कंपनी के स्टार सेल्समैन  बन गया। 

 यह किस तरह हुआ उन्हीं के शब्दों में सुनिए अब अगर मैं किसी ग्राहक के ऑफिस जाता हूं। और वह कहता है क्या? वाइट कंपनी का ट्रक? उसमें कोई खास दम नहीं है अगर कोई मुझे मुफ्त में भी दे दे तो मैं ना लून  मैं तो टाटा कंपनी का ट्रक खरीदने वाला हूं इस पर मैं कहता हूं टाटा कंपनी का ट्रक बहुत अच्छे होते हैं अगर आप वह ट्रक खरीदेंगे तो आपको पछताना नहीं पड़ेगा। टाटा कंपनी बहुत अच्छी है और उसके  सेल्समैन भी बहुत बढ़िया हैं। 
 " यह सुनने के बाद ग्राहक अवाक् रह जाता है। अब् बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं है अगर वह कहता है  कि टाटा कंपनी के ट्रक सबसे अच्छे हैं और मैं मान लेता हूं तो वह आगे Argument कर ही नहीं सकता। जब मैं उससे सहमत हो जाता हूं तो अब पूरी दोपहर यही नहीं दोहरा सकता कि टाटा कंपनी का ट्रक सर्वश्रेष्ठ है  फिर हम अपनी कंपनी वाइट ट्रक के विषय से आगे बढ़ते हैं और मैं उसे वाइट ट्रक की खासियत के बारे में बताता हूं। 

" पहले ऐसा होता था कि जब ग्राहक मेरी कंपनी की बुराई करता था।  तो मैं आग बबूला हो जाता था मैं जोर-शोर से टाटा कंपनी के ट्रक की बुराइयां करने में जुड़ जाता है और मैं जितनी ज्यादा बुराइयां करता था मेरा ग्राहक मेरी प्रतियोगी टाटा कंपनी की उतनी ही अधिक तरफदारी करने लगता था। और मेरे प्रतियोगिता ट्रक खरीदने का उतना ही ज्यादा मन बनाता जाता था 

"जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे हैरत होती है कि मैंने जितना माल भेजा वह भी मैं कैसे भेज पाया।  मैंने बहस करने और झगड़ने में अपनी जिंदगी के कई साल बर्बाद कर दिए अब मैं अपना मुंह बंद रखता हूं। इससे मुझे बहुत फायदा होता है। "

 बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक बार कहा था ;- अगर आप बहस करते हैं और सामने वाला का विरोध करते हैं तो आप कई बार जीत सकते हैं परंतु यह जीत खोखली होगी क्योंकि आपको अपने प्रतिद्वंदी का सद्भाव हासिल नहीं होगा। 

 तो आप खुद ही सोचे।  आप क्या पसंद करेंगे  बहस में नाटकीय ,सैद्धांतिक विजय या  सामने वाले का सदभाव हासिल  करना ? दोनों चीजें एक साथ हासिल होना बहुत मुश्किल है। 

आप  भी जब अपनी बहस की गाड़ी को तेज रफ्तार से चलाते हैं।  तो आप सही पूरी तरह सही हो सकते हैं परंतु जहां तक सामने वाले की मानसिकता बदलने का सवाल है आपके प्रयास उतने ही निरर्थक साबित होंगे जैसे आप ही गलती पर हों। 
 Fadrik Parsons  आयकर सलाहकार थे। वह एक सरकारी टैक्स इंस्पेक्टर से 1 घंटे से बात कर रहे थे $9000 की रकम का सवाल था। पार्सन्स  का दावा था। कि दरअसल यह रकम एक Bad Debt  थी (यह ऐसा कर्ज जिसके भुगतान  की जरा भी उम्मीद नहीं थी ) और इसलिए इस पर टैक्स नहीं लगना चाहिए। इंस्पेक्टर का जवाब था Bad Debt ! बिल्कुल नहीं इस पर तो टैक्स लगेगा। "

Tax Inspector  भावशून्य हठी और जिद्दी था। "मिस्टर पार्सन्स ने हमारे क्लास के सामने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा। तर्कों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता तथ्यों को बताने से भी वह नहीं पिघला हमने जितनी ज्यादा बहस की ,वह  उतनी ही  ज्यादा अड़ता चला गया। इसलिए मैंने Argument का रास्ता छोड़ने का फैसला किया। चर्चा का विषय बदला और उसकी प्रशंसा करने लगा। 

"मैंने उससे कहा मुझे लगता है यह छोटी सि रकम आपके लिए कोई खास महत्व नहीं रखती होगी। क्योंकि आपको तो बहुत बड़ी रकम के महत्वपूर्ण और पेचीदा  मामले निपटाने पढ़ते हैं हालांकि मैंने टैक्सेशन के बारे में पढ़ा है, परंतु मेरा ज्ञान किताबी है जबकि आपको इस विषय में वर्षों तक काम करने का अनुभव है काश ! कि मुझे भी आपकी जितना अनुभव होता! इससे मैं बहुत कुछ सीख सकता था 'और मैंने जो कहा था वह सब सच था। " इसके बाद इंस्पेक्टर अपनी कुर्सी पर सीधा व पीछे की तरफ टिक गया, और काफी देर तक मुझे अपने काम के बारे में बताता रहा।  उसने मुझे बताया कि उसने किस तरह कई बड़े बड़े घपलों को पकड़ा था।  उसका अंदाज धीरे-धीरे दोस्ताना हो गया और कुछ ही समय में वह मुझे अपने बच्चों के बारे में बातें करने लगा।  जब वह गया तो उसने मुझसे कहा कि वह इस समस्या के बारे में थोड़ा और विचार करेगा और कुछ ही दिन में अपना फैसला बता देगा। 
"3 दिन बाद वह लौटकर मेरे ऑफिस में आया और उसने मुझे बता दिया कि उसने मेरे टैक्स रिटर्न को उसी रूप में स्वीकार कर लिया है यह tax inspector  बहुत ही साधारण सी मानवीय कमजोरी का प्रदर्शन कर रहा था हर इंसान की तरह उसे भी महत्व चाहिए था। जब तक मिस्टर पार्सन्स उससे बहस करते रहे तब तक वह प्रबलता से बहस करके  अपने आप को महत्वपूर्ण साबित करता रहा।  परंतु जब मिस्टर पार्सन्स ने उसके महत्व को स्वीकार कर लिया तो बस खत्म हो गई और वह सहानुभूतिपूर्ण  और दयालु इंसान में बदल गया।
 
              बुद्ध ने कहा है "नफरत नफरत से नहीं, बल्कि प्रेम से खत्म होती है। " और गलतफहमी भी बहस से नहीं  बल्कि समझदारी, कूटनीति ,सद्भावना, दूसरे  के नजरिए को समझने की इच्छा से खत्म होती है। 

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