कोमल बनो



चीन के महान दार्शानिक कंफ्यूशियस बिस्तर पर पड़े जिंदगी की आखिरी सांस ले रहे थे। जिनकी बीमारी की खबर परिजनों,मित्रों,शुभचिंतकों और शिष्यों को जैसे ही मिली। सभी भागे छूटे। एक शिष्य प्रणाम कर चरणों के पास बैठ गया। चरण दबाते हुए बोला ,'गुरुदेव ! वैसे तो आप हमें जीवन भर सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहे। किन्तु मैं चाहता हूँ की अंतिम समय में कोई ऐसी बात बताएं जो सम्पूर्ण जीवन की उपदेश का निचोड़ हो। '

    कंफ्यूशियस कहने लगे ,वत्स ! तनिक मेरे मुँह में देखकर बताओ की जीभ है या नहीं ?'वहां मौजूद सभी लोग यह सुनकर दुविधा में पड़ गए की आखिर इनको क्या हो गया ? शिष्य ने बताया ,'गुरुदेव जीभ तो है ,दन्त एक भी नहीं है। '

'तुम सही कह रहे हो ?' कंफ्यूशियस ने अपनी रहस्यमई नजर सभी पर डाली , जीभ तो जन्म के साथ आये थे ,पर दांत बाद में आये थे ,बाद में आने वाले दांत तो विदा हो गए पर जीभ आज भी विधमान है। कोई बता सकता है की ऐसा क्यों ? ' उनके इस प्रश्न का जवाब कोई नहीं दे सका तो

 कंफ्यूशियस बोले , 'दांत क्रूर एवं कठोर होते हैं , अतः बाद में जन्म लेने पर भी ख़तम हो गए। जीभ अति कोमल होती है ,इसी कारन आज भी बनी  हुई है। आप सभी को मेरी अंतिम घडी में यही सन्देश है की हमें जीभ की तरह कोमल होना चाहिए ,दाँतों की तरह कठोर और क्रूर नहीं। यह सदैव याद रखना चाहिए की कोमलता दीर्घजीवी और कठोरता अल्पजीवी तथा शीघ्र नष्ट होने वाली होती है। ' 
  
इस कहानी से हमें यही संदेह मिलती है की कोमल  बनो कठोर  नहीं।  

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