विवादों को ऐसे हल करें

 लोगों से बात शुरू करते समय आप अपने मतभेदों का जिक्र सबसे पहले ना करें। आप पहले उन बातों पर जोर  दीजिए और जोर देते रहिए। जिन पर आप दोनों सहमत हों। यदि संभव हो तो सिर्फ इस बात पर जोर दीजिए कि आप दोनों का लक्ष्य एक ही है और आप में अंतर सिर्फ उस साधन का है जिसके माध्यम से आप लक्ष्य तक पहुंचना चाहते हैं। 

शुरुआत से ही सामने वाले व्यक्ति से "हां, हां "करवाते रहिए जहां तक हो सके ऐसी नौबत ही ना आने दे कि सामने वाला व्यक्ति "ना" कहे। 

 एक बार सामने वाला "ना" कर देता है।  तो बाद में उसे टस से मस करना मुश्किल होता है। एक बार "ना" कहने के बाद आपके व्यक्तित्व का गर्व यह मांग करता है कि आप अपनी बात पर अड़े रहे। आपको बाद में लग सकता है कि आपने गलती से ना कर दिया था। परंतु आप अपने गर्व के कारण यह स्वीकार नहीं करना चाहते। आपने एक बार जो कह दिया आप फिर उस पर अड़े रहना चाहते हैं। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। कि बातचीत की शुरुआत कहां से हो। 

समझदार वक्ता अपने श्रोताओं से शुरू से ही "हाँ " कहलवाता जाता  है। इस तरह श्रोताओं की मानसिकता सकारात्मक दिशा में बन जाती है। यह किसी बिलियर्ड्स की गेंद की गति की तरह है। एक दिशा में जाने के बाद इसकी दिशा बदलने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। और इसे विपरीत दिशा में ले जाने के लिए तो बहुत अधिक शक्ति की जरूरत पड़ती है। यहां पर मनोवैज्ञानिक पैटर्न बहुत स्पष्ट है। जब कोई व्यक्ति ना कहता है और वह वास्तव में नकारात्मक होता है तो वह सिर्फ इस शब्द को कहने से कुछ अधिक कर रहा है। उसका पूरा शरीर उसकी ग्रंथियां उसका नर्वस सिस्टम  और उसका मांस पेशी तंत्र सभी एक नकारात्मक स्थिति में आ जाते हैं। परंतु आम तौर पर बहुत सूक्ष्म परन्तु नजर में आने वाले लक्षण देखे जा सकते हैं कि शारीरिक अलगाव है या उसकी तैयारी है पूरा न्यूरोमस्कुलर सिस्टम स्वीकार करने के विरोध में हो जाता है।

 इसके विपरीत जब कोई व्यक्ति "हां" कहता है तो अलगाव के कोई लक्षण नजर नहीं आते पूरा सिस्टम आगे की तरफ बढ़ने वाला स्वीकार करने वाला और खुला होता है।

इसलिए हम शुरुआत में ही सामने वाले से जितनी बार हां करवाते हैं हम अपने अंतिम प्रस्ताव को मनवाने में सफल होने के उतने ही करीब आ जाते हैं। हां कहलवाने कि यह तकनीक बहुत आसान है फिर भी इसे अक्सर लोगों द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है। 

ऐसा लगता है कि ज्यादातर लोग शुरुआत में ही विरोध प्रदर्शन करके अपना महत्त्व साबित करना चाहते हैं। जब कोई विद्यार्थी या कोई ग्राहक, बच्चा ,पति या पत्नी शुरू में ना कह देता है। तो फिर उससे हां करवाने के लिए आपको ज़्यादा बुद्धिमानी और धैर्य की जरूरत होती है। या आप इसे खुद अपने ऊपर महसूस कर सकते हैं। 

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